देश का अन्नदाता सड़क पर आंदोलन कर रहा है तो मिडिल क्लास को क्यों साथ आना चाहिए?

 BY- अखिल सिंह

प्रिय मिडिल क्लास

मैं अखिल आप सभी को एक खुला पत्र लिख रहा हूँ, मेरी बातें आपको कड़वी लगेंगी पर कहना जरूरी है ताकि आप कुछ पल के लिए अपने आप से सवाल करें और मन्थन करें। पूरी दुनियां से भारत का मिडिल क्लास बिल्कुल अगल है, धर्म, जाति, संस्कृति से लेकर रंग और भाषा तक में यहां का मिडिल क्लास बंटा हुआ है।

पूरी दुनियां में सबसे डरपोक अगर कोई क्लास है तो वो मिडिल क्लास ही है, पर भारत का मिडिल क्लास सबसे ज्यादा डरपोक है, ऐसा नहीं है कि जीने के लिए संघर्ष नहीं करते हैं, करते हैं पर डर और लोवर क्लास के साथ बार्गेनिंग के साये में।

डर के साये में ये लोग जिंदगी भर संघर्ष करते हैं, लोअर क्लास से बार्गेनिंग के बारे में सोचते हैं और डर के साये में ही एक दिन मर जाते हैं, यही वजह है कि हमेशा से सबसे ज्यादा आर्थिक बोझ इन्हीं को झेलना पड़ता है (लोअर क्लास की अपनी एक अगल सोसिओ-इकनोमिक और सोसिओ-पोलिटिकल समस्या है)।

भारत का मिडिल क्लास डर का संघर्ष करते हुए अपर क्लास में शामिल होने की कोशिश करता है, इस दौरान यह मिडिल क्लास लोअर क्लास के साथ बारगेनिंग करता है और उनके संघर्ष को एक सिरे से नकारते हुए अपना Frustration जाहिर करता है जैसे- अगर एक ठेले वाले से सब्जी खरीदना हो तो उसके साथ bargaining करता है, दस की जगह आठ रुपये देने की कोशिश करता है, अगर वह ठेला वाला मना करता है तो मन ही मन उसके प्रति नफरत किये सब्जी खरीद लेता है।

दिल्ली मुम्बई जैसे बड़े शहरों में अगर किसी रिक्सा से जाना हो तो उनके साथ यह मिडिल क्लास bargaining करता है। नफरत और घृणा के साथ बात करते हुए पचास की जगह 30 रुपये देने की कोशिश करता है। यहां पर भी अगर रिक्सा वाला ना माने तो, बात उसके साथ मार पीट तक आ जाती है।

अपने घर में मेड को जितना हो सके कम से कम तनख्वाह में रखना चाहते हैं, और ज्यादा से ज्यादा उससे काम कराना चाहते हैं। जितना उसे एक महीने में तनख्वाह नहीं देते हैं उससे ज्यादा ये लोग ममोच, और पिज्जा खा लेते हैं। उस मेड को काहिल, गवार का खिताब अगल से मिलता है।

हर वो चीज से बार्गेनिंग करना चाहते हैं, जिसे लोअर क्लास बेचता है चाहे श्रम हो या कोई उत्पाद। मिडिल क्लास इतना डरा होता है कि स्वार्थीपन इनके मन में घर कर जाता है, यही वजह है कि ये लोग कभी भी एक बड़े आंदोलन में शरीक नहीं होते हैं और ना ही एक इनके बीच का कोई एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर पाता है, इसके पीछे की एक सबसे बड़ी वजह है कि ये लोग अपने ही क्लास के भीतर एक दूसरे से जलते हैं और नफरत करते हैं।

राजनीतिक पार्टियाँ इसी का फायदा उठाते हुए समाज का एक बड़ा बोझ इनके ठीकरे फोड़ देता है, और इनकों बताने की कोशिश करता है कि लोअर क्लास की वजह से ही आपको ये सारी तकलीफें हो रही है। मिडिल क्लास के लोग अपर क्लास को सभ्य और ईमानदार समझते लगते हैं, एक सवाल भी अपर क्लास से करने की जरूरत नहीं करते हैं।

एक साधारण उदाहरण है। दिल्ली की मिडिल क्लास को अगर ममोच खाना है तो ये लोग सिटी मॉल में जाएंगे और 120 रुपये प्लेट तक का ममोच बिना अवसाद रहे खा लेंगे, जबकि इनकों पता है कि सड़क के किनारे ममोच बेचने वाला सिटी मॉल के ममोच से अच्छा बनाता है । ऐसी हजारों अनगिनत घटनाएं हैं जिसे मिडिल क्लास के लोग करते हैं, अब आता हूँ असल मुद्दे पर

बीजेपी ने जो तीन कृषि कानून बनाया है, यह कानून पूर्णरूप से कृषि की बुनियादी ढांचा को खत्म कर देगा जिस पर आज ये कृषि प्रधान देश खड़ा है। एक साधारण सा उदाहरण है – अडानी अम्बानी जैसे बड़े पूंजीपति लोग बड़े पैमाने पर किसानों के फसल को औने पौने दाम में खरीद कर कोल्ड स्टोरेज में रख लेंगे (जैसे प्याज को रखा जाता है और वक्त आने पर अपने अनुसार मूल्य तक कर के बाजार में बेचा जाता है ) फिर अपने अनुसार मूल्य तय करेंगे और बेचेंगे।

इसका सबसे बड़ा भार मिडिल क्लास और लोअर क्लास पर पड़ेगा, अगर आज इस देश का अन्नदाता सड़क पर आंदोलन कर रहा है तो मिडिल क्लास की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि उनका साथ दे, सड़क पर उतरे और एक आवाज में इस देश की कृषि को बचाने में आंदोलित हों । मिडिल क्लास का अगर कोई दुश्मन है तो वो अपर क्लास है इस बात को जितना जल्दी हो सके तो समझ लें।

अगर आज भी आपने अपनी आंखे मूंदे रखा तो आपकी हालात उस अमेरिका और यूरोपियन देशों की तरह हो जायेगी जहां पर लोग जीने के लिए चार चार नौकरियां करते हैं फिर भी एक अच्छा खाना नहीं खा पाते हैं, क्योंकि फ़ूड चेन का पूरा स्ट्रक्चर अपर क्लास के हाथ में होता है ।

शुक्रिया

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