श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से रेलवे ने कमाए 429 करोड़ रुपये; क्या यह है आपदा में अवसर?

BY- सलमान अली 

गरीबी अपने आप में एक अभिशाप है। भारत जैसे देश में जहां मुकेश अम्बानी दुनिया के 5वें सबसे अमीर आदमी रहते हैं वहीं करोड़ों लोग ऐसे हैं जो भुखमरी का शिकार हैं।

1991 के उदारवाद के बाद लोगों को काम-धंधा तो जरूर मिला लेकिन उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं आया। मुनाफा पूंजीपतियों की जेब में जाता रहा और आम आदमी मजदूर बनकर ही रह गया।

इन मजदूरों की हालत कोरोना संकट के समय और दयनीय हो गई है। लोग भूखे मरने को विवश हैं। ऐसी स्थिति में जब सरकार को इनके लिए बेहतर विकल्प तलाशने चाहिए थे तब उसने इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया।

बड़े-बड़े महानगरों में इनके पास न तो घर था और न ही ऐसी व्यवस्था जिससे ये लॉकडाउन में एक हफ्ता भी गुजार लेते। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा दो चार दिन तो गुजर गए लेकिन फिर इनको अपने गांव की झोपड़ी के अलावा कुछ नहीं दिखा।

मोदी सरकार इनके परिवहन तक की व्यवस्था नहीं कर पाई और लाखों मजदूर हज़ारों किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करने लगे। कुछ मजदूरों की इस सफर में जान भी चली गई।

कुछ समय बाद सरकार जागी तो उसने इन श्रमिकों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई। लेकिन उसने इनसे पूरा किराया वसूला। यही नहीं कुछ ऐसी भी शिकायतें मिली जब मजदूरों से ज्यादा पैसा वसूल लिया गया।

अब एक आरटीआई के माध्यम से यह खुलासा हुआ है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से रेलवे ने 429 करोड़ रुपये कमा लिए हैं। आंकड़ों के अनुसार 29 जून तक कुल 4615 ट्रेनें चलाई गईं जिनसे रेलवे ने 428 करोड़ रुपए कमा लिए। वहीं जुलाई में 13 ट्रेनें चलीं जिससे एक करोड़ रूपये की आमदनी हुई।

अब सवाल यह है कि मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए जो राज्य सरकारों ने पैसे दिए वह क्या हुए। आइए एक नजर डालते हैं इन आंकड़ों पर।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार-

  • 15 लाख प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने के लिए गुजरात सरकार ने रेलवे को 1027 ट्रेनों के संचालन के लिए 102 करोड़ रुपए दिए।
  • महाराष्ट्र सरकार ने 844 ट्रेनों के संचालन के लिए 85 करोड़ रुपए दिए।
  • तमिलनाडु ने 271 ट्रेनों के लिए 34 करोड़ रुपए दिए।
  • उत्तर प्रदेश ने 21 करोड़
  • बिहार ने 8 करोड़
  • पश्चिम बंगाल ने 64 लाख रुपये दिए

उपरोक्त आंकड़े रेलवे ने एक आरटीआई के जवाब में दिए गए हैं। आरटीआई कार्यकर्ता अजय बोस ने एक याचिका दायर कर रेलवे से यह जानकारी मांगी थी।

एक अन्य आंकड़े में यह भी जानकारी प्राप्त हुई है कि रेलवे ने 63 लाख प्रवासी मजदूरों को घर भेजने के लिए कुल 2141 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। इस हिसाब से यदि आप एक आदमी पर किये गए खर्च को निकालेंगे वह 3400 रुपये आएगा।

मतलब रेलवे ने औसतन एक आदमी को घर भेजने के लिए 3400 रुपए खर्च किये। एक अधिकारी ने उपरोक्त आंकड़ो की पुष्टि भी की और कहा कि हमने 63 लाख प्रवासी मजदूरों को घर भेजकर 429 करोड़ रुपए का राजस्व हासिल किया है। इनके अनुसार श्रमिक स्पेशल ट्रेनों पर प्रति व्यक्ति औसत किराया 600 रुपए है लेकिन खर्च रेलवे ने 3400 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से किया है।

अब सवाल यह भी है कि ऐसी आपातकालीन स्थिति में क्या रेलवे जनता की भलाई के लिए कोई काम नहीं कर सकती थी। भले ही रेलवे फ्री में ट्रेनें न चलाती लेकिन कम से कम वह मुनाफा तो न ही कमाती।

उन गरीब मजदूरों से मुनाफा कमा कर रेलवे को तो अवश्य फायदा हो गया लेकिन देश की जो समाजवादी व्यवस्था है उसका क्या? क्या वह सिर्फ संविधान की उद्देशिका तक सीमित रह गया है? जब पूंजीपतियों के लिए लाइट से लेकर जमीन तक फ्री में दी जा सकती है तब उन मजदूरों को क्या फ्री में घर नहीं पहुंचाया जा सकता था?

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हमारे प्रधानमंत्री अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन वह जनता के कल्याण के लिए इतना भी नहीं कर सकते थे। आपदा में अवसर की बात कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेलवे में अवसर की तलाश कर रहे थे?

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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