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सरकार द्वारा लाया गया धर्मांतरण कानून संविधान विरोधी ही नहीं मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है

 BY- कमलेश सिंह

आज जहां दुनिया टेक्नोलॉजी / साइंस, व्यवसाय आदि में कामयाबी हासिल कर रही है वही हमारी सरकार सिर्फ सिर्फ लव जिहाद (कथित धर्म परिवर्तन) को रोकने पर आतुर है. किसी अन्य क्षेत्र पर क्यों कोई बात नहीं हो रही, हमारे पास शिक्षा पर काम करने के लिए कोई मुद्दा नहीं है, रोजगार, स्वास्थ्य पर बात करने का समय नहीं है.

पर आरएसएस के प्रोजेक्ट पर काम कर रही सरकार नए धर्मांतरण विरोधी कानून को लाकर लव जिहाद पर समाज में बात करा रही है. सरकार यह दिखा रही है कि हम सिर्फ धर्म बचाने का ठेका लेकर पैदा हुए हैं.

धर्म जो व्यक्ति का निजी मामला है और हर कोई इसे मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है उसे जबरन राजनीति का विषय बनाया जा रहा है.

आजादी के आंदोलन के नेताओं व विद्वानों ने संविधान का निर्माण किया था क्या उस समय धर्म नहीं था या लोगों के विचार नहीं थे या उनके सोचने समझने की क्षमता क्षीण थी? नहीं !

आज राज्य सरकार धर्मांतरण कानून बनाने हेतु तत्पर हैं। क्या यह कानून संविधान के दायरे में है? क्या यह कानून लोगों के विचार को समाप्त करने के लिए है? क्या आज जनमानस के सोचने की क्षमता सिर्फ सरकारों पर निर्भर है?

क्या चुनाव करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ सरकार का होगा (क्या खाना है, कहां रहना है, क्या पहनना है किसी से मिलना है आदि इत्यादि) अथवा ये आम आदमी के अधिकार रहेंगे यह बड़ा सवाल आज खड़ा हो गया है.

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शायद सरकार भी अब संविधान या किसी कानून या माननीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की दी गई विभिन्न व्यवस्थाओं को नहीं मानती है। या यूं कहें सत्ता की हनक जो मर्जी वही करेंगे हर जोर जुल्म करने का कानून हमारा है.

समाज कहां जा रहा है सबको पता है और बहुत सारे मामले अदालतों में जाते हैं जहां बात सिर्फ कानून की होती है और अदालतें निर्णय देती हैं जिसमें न्यायालय द्वारा व्याख्या भी किया जाता है।

वर्ष 2014 में एक मामला नूरजहां उर्फ अंजलि बनाम उत्तर प्रदेश सरकार माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में गया जिसमें धर्म परिवर्तन को मान कर दो लोगों के पवित्र बंधन को समाप्त कर दिया.

एक अन्य मामला प्रियांशी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार हुआ जिसमें न्यायालय ने इसे अभिव्यक्ति व स्वतंत्र विवाह को नहीं माना.

लेकिन वर्ष 2020 की 11 नवंबर में एक और मामले में सलामत अंसारी व प्रियंका खरवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रियांशी हुआ नूरजहां मामले में एकल पीठ का फैसला सही नहीं है।

और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो रहने का अधिकार है. यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का मूल तत्व है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि हम यह समझने में नाकाम हैं कि जब कानून दो व्यक्तियों को चाहे वह समान लिंग के ही क्यों ना हों शांति पूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो किसी को भी चाहे वह किसी व्यक्ति, परिवार द्वारा ही क्यों ना हो उनके रिश्ते पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है.

(जहां न्यायालय ने समलैंगिकता को माना है व्यभिचार को समाप्त कर दिया गया है एवं लिव इन रिलेशनशिप को भी माना है) कोर्ट ने दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण किया और अपने निर्णय में यह भी तय कर दिया कि कानून से बढ़कर कोई नहीं. कोर्ट ने इस सम्बन्ध में लिखी एफआईआर को भी रद्द कर दिया.

कोर्ट के अनुसार हर किसी को अपनी मर्जी से चुनाव करने का अधिकार प्राप्त है. हम सभी को अपने मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने का हक है. जो हमसे कोई अवैधानिक कानून बना कर छीन नहीं सकता और अगर ऐसा करना है तो वह संविधान विरोधी/विधि विरुद्ध है।

पर योगी सरकार को इससे क्या वास्ता वह तो न संविधान को मानती न ही न्यायालय का सम्मान ही करती है तब ऐसे में नागरिक समाज का ही यह दायित्व है कि वह उसे संविधान का सम्मान करने और न्यायालय के निर्णय मानने के लिए बाध्य करे. धर्मांतरण विरोधी कानून के खिलाफ भी नागरिकों की एकता वक्त की जरूरत है.

लेखक हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं। उपरोक्त विचार उनके निजी हैं।

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