दलित-आदिवासी विरोधी है पंचायत चुनाव में उम्र और शिक्षा की बाध्यता

 BY- सलमान अली

यदि आपको एक तबके को पीछे करना हो तो आप ऐसा कानून बना दीजिए जिससे वह तबका बिना दौड़ लगाए ही प्रतियोगिता से बाहर हो जाये। ऐसा दुनिया में कई देशों में होता है और शायद कभी रुके भी न।

जिस तबके का शासन होता है वह नहीं चाहता उसके नीचे के लोग उससे प्रतियोगिता करके आगे बढ़ें। अमेरिका का लोकतंत्र दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है लेकिन अभी भी वहाँ रंगभेद के उदाहरण रोज देखने को मिलते रहते हैं।

अमरीका की जेलों में श्वेत लोगों की अपेक्षा अश्वेतों की संख्या काफी ज्यादा है। प्रशासनिक स्तर पर भी अनुपात के हिसाब से काफी अंतर है और वोट प्रतिशत के कारण विधायिका में भी श्वेत लोगों की भरमार है।

यही हाल भारत का है जहाँ की जेलों में दलित, मुस्लिम और पिछड़ों की तादात जनसंख्या के हिसाब से ज्यादा है। यह आंकड़े हाल ही में एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़े के बाद सामने आए हैं।

यह अनुपात सिर्फ जेलों तक सीमित नहीं है, प्रत्येक क्षेत्र का यही हाल है। आप आंकड़े उठा कर देखेंगे तो पाएंगे शिक्षा व्यवस्था से लेकर सरकारी नौकरियों में भी यही हाल है। आरक्षण होने के बावजूद जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व आज भी नहीं हो पाया है। यहाँ हम सिर्फ सरकारी व्यवस्था की बात कर रहे हैं।

प्राइवेट सेक्टर में तो आदिवासी, पिछड़े, दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व नाममात्र का ही है। कह सकते हैं कि सागर में बूंद डालने जैसा। और जिस तेजी के साथ सरकार सब कुछ बेचकर निजीकरण की ओर अग्रसर है उससे वह दिन दूर नहीं जब यह तबका सिर्फ लेबर का काम ही करेगा।

सरकार शिक्षा का निजीकरण करके उस तबके को दूर कर रही है जिसके पास पढ़ने के पैसे नहीं हैं। यह तबका शिक्षा से वंचित होकर एक बड़े लेबर के रूप में उभरेगा जिसका फायदा पूंजीवादी लोग अपने व्यापार को बढ़ाने में करेंगे।

इसका उदाहरण आप पंचायत में शिक्षा और दो बच्चों के मिनिमम क्राइटेरिया से कर सकते हैं। देश के कई राज्यों में यह व्यवस्था लागू भी की जा चुकी है लेकिन अभी भी बहुत सारे राज्य हैं जिनमें लागू नहीं है। इनमें से एक है उत्तर प्रदेश जिसमें यह व्यवस्था आने वाले पंचायत चुनाव में लागू हो सकती है।

चुनाव आयोग अगले साल फरवरी से मई महीने तक उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने में सक्षम होगा। कुछ मंत्री इसके पक्ष में भी हैं और अधिकारियों ने संकेत भी दे दिए हैं। अब यह चुनाव अप्रैल में तय माना जा रहा है।

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योगी सरकार पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चे और 12वीं परीक्षा का क्राइटेरिया रख सकती है। कुछ लोग 8वीं पास की योग्यता के पक्ष में हैं। यदि ऐसा होता है तो जिनके दो बच्चों से ज्यादा हैं और जो लोग 8वीं तक नहीं पढ़ें हैं वह पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र सिंह चौधरी ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस मामले में सुझाव दे चुके हैं। वहीं केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान ने 11 जुलाई को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर दो से ज्यादा बच्चों वालों के पंचातीराज चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की थी।

इन सभी पहलुओं पर अंतिम फैसला सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे। इसके लिए पंचायती राज के कई प्रावधानों में संशोधन भी लाया जा सकता है। लोगों का मानना है कि यदि ऐसा होगा तो जनसंख्या नियंत्रण कानून के लिए यह एक संकेत होगा। वहीं इससे लोग जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित भी होंगे। लेकिन क्या वाकई ऐसा ही है?

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अब आप अंदाजा लगाइए कि जिस देश में अभी 80 प्रतिशत लोग भी पढ़े लिखे नहीं हैं वहां आप चुनाव लड़ने के लिए शिक्षा की बाध्यता रख देते हैं। करीब 30 प्रतिशत आबादी को आप सीधे बिना प्रतियोगिता के ही बाहर कर देते हैं।

यह 30 प्रतिशत आबादी कौन सी है? आप यदि सही से अनुमान लगाएंगे तो पाएंगे यह वही आदिवासी, दलित, मुस्लिम समुदाय के लोग हैं जो अशिक्षित हैं और गरीब भी।

पहले सरकार शिक्षा का व्यापारीकरण करके इनको शिक्षित होने से रोक रही है और फिर उनके कुछ आगे बढ़ने के रास्ते भी। यदि यह शिक्षित होंगे तो अपने आप ही जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लग जायेगा। लेकिन हम शिक्षा को बेहतर बनाने के बजाय उसे बाजारू बना रहे हैं।

शिक्षा से यह तबका भी समझ पायेगा कि कम परिवार से अच्छा जीवन जिया जा सकता है। लेकिन इनकी यह स्थिति आने ही नहीं दी जा रही है। इसके पीछे सत्ताधारियों की जो भी सोच हो लेकिन यह देश की प्रगति वाली सोच नहीं है।

आप देश के एक बड़े तबके को पीछे धकेल के तरक्की नहीं कर सकते बस इतना समझना चाहिए। जब तक इनके जीवन को हम अच्छा नहीं बनाएंगे आगे नहीं बढ़ पाएंगे।

भले ही कम पढ़े लिखे लोगों के ग्राम प्रधान बनने से गांव की कम तरक्की हो लेकिन इससे समाज के पिछड़े तबके को मुख्यधारा में लाया जा सकता है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी शायद यही कहती है।

और यदि बिना पढ़े लिखे विधायक और सांसद बना जा सकता है तो ग्राम प्रधान क्यों नहीं?

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