दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी धारक युवा एकदम अनोखे तरीके से लड़ रहा है प्रधानी चुनाव

BY – FIRE TIMES TEAM

आपको याद होगा पिछले वर्ष सितम्बर महीने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन को देश के युवाओं ने बेरोजगारी दिवस के रूप मनाया था। उनका मूल उद्देश्य सिर्फ रोजगार की समस्या के मुद्दे पर पीएम का ध्यान खींचना था।

इसके बाद बेरोजगार युवाओं ने नये वर्ष में ट्विटर पर रोजगार के लिए ट्रेंड चलाया। इस मामले में ज्यादातर वे युवा थे जो या तो किसी परीक्षा में सम्मिलित थे या परीक्षा की तिथि का इन्तजार कर रहे थे।

लेकिन ऐसे तमाम युवा हैं जो रिक्तियों के निकलने का इन्तजार सालों से कर रहे हैं। लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल रहा है। विभिन्न विभागों के अलांवा राज्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को छोड़ दें तो सिर्फ केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ही तमाम पद खाली पड़े हैं।

आपको बता दें कि पिछले वर्ष फरवरी में मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने लोकसभा में कहा था, “रिक्तियों को भरना एक सतत प्रक्रिया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सूचित किया है कि वर्तमान में देश भर के विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 18243 स्वीकृत शिक्षण पद और 34928 स्वीकृत गैर-शिक्षण पद हैं, जिनमें से 6688 शिक्षण पद और 12323 गैर-शिक्षण पद आज तक खाली पड़े हुए हैं।”

साल 2019 में 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों में धरना प्रदर्शन हुए और तमाम डिबेट भी हुई। इस आरक्षण प्रणाली पर एससी/एसटी अभ्यर्थियों का आरोप लगाया था। इससे देश की राजनीति भी गरमा गई थी।

आज हम आपको एक ऐसे पीएचडी धारक बेरोजगार से रूबरू कराने जा रहे हैं। जो एकदम अलग तरीके से ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है।

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में डॉ अखिल कुमार गौतम ग्राम प्रधान पद के लिए बड़हरा रानी गांव से अपने आपको प्रत्याशी घोषित कर चुके हैं। जो गांव में तख्तियों पर अपनी शिक्षा का हवाला देकर प्रचार कर रहे हैं। इसके लिए वह घंटो चौराहों और पेड़ नीचे बैठे रहते हैं।

डा. अखिल का कहना है कि इस देश की जाति और उस जाति की हिंसा को खत्म करने के लिए अम्बेडकर ने लोकतंत्र को स्थापित करते हुए संविधान का निर्माण किया और दलितों के लिए आरक्षण लागू किया ताकि आने वाली दलित नश्ले जातिय हिंसा को ना झेले और उन्हें सामाजिक न्याय मिले।

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वे कहते हैं कि मैं एक शिक्षित दलित हूँ जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी किया है पर इस उच्च शिक्षा को पाना इतना आसान नहीं रहा । जिंदगी के कई मोड़ पर मुझे जाति का ध्वंश झेलना पड़ा यहां तक दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े संस्थाओं में भी जाति के नाम पर चिन्हित करते हुए कुछ जातिवादी लोगों ने मुझे परेशान किया ।

जिंदगी के हर मोड़ पर संघर्ष करते हुए मैंने महसूस किया कि शिक्षा से ही जाति, गरीबी, हिंसा, दंगा जैसे चीजों को खत्म किया जा सकता है । पंचायती चुनाव में बेहद ही वीभत्स और गंदी राजनीति की जाती है जहाँ पर पैसा, दारू को खुले आम बाटा जाता है, जहाँ पर जातिय समीकरण काम करता है, जातीय वर्चस्व के आधार पर प्रधान को चुना जाता है, इसे एक प्रकार से संस्कृति में तब्दील कर दी गई है ।

एक प्रधान की भूमिका इतना अधिक महत्वपूर्ण होता है कि अगर वो चाहे तो समाज में एक अभूतपूर्व क्रांति ला सकता है । घरेलू हिंसा को खत्म कर सकता है, दंगे वाली राजनीति को खत्म कर सकता है । शिक्षा पर काम कर सकता है, जेंडर संवेदनशीलता पर कार्यक्रम कर कानून की बुनियाद जानकारी लोगों तक पहुंचा सकता है । घरेलू कुटीर उद्द्योग पर काम कर सकता है, कला, साहित्य, खेल को प्रोत्साहित कर सकता है । -अखिल कुमार गौतम

हमें एक ऐसे स्वस्थ देश का निर्माण करना है जहां पर दारू, पैसा जैसी घटिया संस्कृति के लिए कोई भी जगह ना हो । एक ऐसा स्वस्थ समाज जहाँ पर एक औरत भी अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हुए, मर्दों से कंधा से कंधा मिलाते हुए सिर्फ आरक्षित ही नहीं अनारक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़े । उसे किसी भी तरह का भय ना हो । उसे उसकी स्त्रीत्व के चलते नकारा ना जाए ।

भ्रष्टाचारी और दलालों को सत्ता से बाहर करना जरूरी है ताकि समाज एक स्वस्थ जीवन जी सके । इस तरह की संस्कृति को लाने के लिए एक शिक्षित युवा को राजनीति में उतरना ही होगा । ताकि लोकतंत्र को बचाया जा सके ।

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