जानिए MSP अनिवार्य करने से आखिर सरकार को क्या है नुकसान

BY – FIRE TIMES TEAM

कृषि कानून के विरोध में किसान देश की राजधानी नई दिल्ली में डटे हुए हैं। सरकार और किसानों के बीच पांच बार बात भी हो चुकी है, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। किसान अपनी मांगों को लेकर अड़े हैं और सरकार किसानों को मनाने कोशिश कर रही है।

किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा कि कृषि कानूनों की वापसी के अलावा एक प्रमुख मांग एमएसपी को लेकर भी है, और वह यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमत पर खरीद को अपराध घोषित करे और एमएसपी पर सरकारी खरीद लागू रहे।

प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कृषि मंत्री समेत कई केंद्रीय मंत्री किसानों को इस बात का लगातार आश्वासन दे रहे हैं कि एमएसपी की व्यवस्था की जैसे पहले थी, वैसे अब भी रहेगी, लेकिन एमएसपी कानून को लेकर कोई कुछ नहीं बोल रहा। और किसान एमएसपी की गारंटी चाहते हैं। किसान चाहते हैं कि कृषि कानून में इसका जिक्र होना चाहिए।

सरकार का तर्क है कि पहले के कानूनों में भी एमएसपी का कानूनी मान्यता देने की बात नहीं थी, इसलिए नये कृषि कानूनों में भी इसे शामिल नहीं किया गया। किसान संगठनों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लोग लगातार सरकार से पूछ रहे हैं कि आखिर एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाने में हर्ज ही क्या है?

अब किसान संगठनों ने 14 अगस्त को देशव्यापी धरने का ऐलान किया है। उनकी अब सीधी मांग यह है कि यह तीनों कानून रद्द किए जाएं, नहीं तो यह धरना चलता रहेगा। वहीं केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर बार-2 किसानों से अपील कर रहे हैं कि वह धरना समाप्त कर दें।

मोदी सरकार किसानों को उनकी फसलों की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी देने का दावा करती है। उधर, किसान सरकार द्वारा तय एमएसपी पर फसलों की गारंटी की मांग कर रहे हैं। मगर, एमएसपी की गारंटी देने पर सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि सरकार को बजट का एक बड़ा हिस्सा एमएसपी पर ही खर्च होगा।

विशेषज्ञ बताते हैं कि मौजूदा एमएसपी पर सारी फसलों की खरीद के लिए सरकार को करीब 17 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। केंद्र सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिश पर हर साल 22 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करती है। इनमें से खरीफ सीजन की 14 फसलें हैं और रबी की छह फसलें।

इसके अलावा जूट और कोपरा के लिए भी एमएसपी तय की जाती है। वहीं, गन्ना के लिए फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस यानी एफआरपी तय की जाती है।

हालांकि एमएसपी पर सरकार सिर्फ धान और गेहूं की खरीद व्यापक पैमाने पर करती है, क्योंकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए इन दोनों अनाज की जरूरत होती है।

हालांकि दलहनों और तिलहनों की खरीद भी प्रमुख उत्पादक राज्यों में होती है, लेकिन यह खरीद उसी सूरत में होती है, तब संबंधित राज्य फसल का बाजार भाव एमएसपी से कम होने पर इस बावत का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजता है।

अधिकारी बताते हैं कि एमएसपी के निर्धारण का मतलब है यही है कि किसानों को फसलों का इतना भाव अवश्य मिलना चाहिए, इसलिए जब किसी दलहन व तिलहन फसल बाजार भाव एमएसपी से कम हो जाता है, तो वहां सरकारी एजेंसी किसानों से एमएसपी पर खरीद करती है।

मगर, यह संभव नहीं है कि सरकार ही किसानों से सारी फसलें खरीदें इसलिए जब कुल उत्पादन का करीब एक तिहाई तक सरकार खरीदती है, तो स्वाभाविक है कि वहां बाजार भाव उपर आ जाता है, इसका किसानों को वाजिब दाम मिलने लगता है। कुछ राज्यों में सरकार मक्का व अन्य फसलें भी खरीदती है।

एमएसपी पर खरीद अनिवार्य करने का मतलब निजी कारोबारियों भी इस पर खरीदने को बाध्य होंगे। कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना कहते हैं कि अगर प्राइवेट सेक्टर के लिए एमएसपी पर खरीद अनिवार्य किया जाएगा, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार फसलों का भाव ज्यादा होने पर निजी कारोबारी आयात करना शुरू कर देगा।

ऐसे में सरकार को सारी फसल किसानों से खरीदनी पड़ेगी, तो आज के रेट के हिसाब से इसके लिए सरकार को 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करना होगा।

सरदाना ने कहा, एमएसपी पर सारी फसलों की खरीद का कुल खर्च आज के रेट के हिसाब से करीब 17 लाख करोड़ रुपये आएगा, जोकि सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा होगा।

इसके बाद एक लाख करोड़ रुपये फर्टिलाइजर सब्सिडी और एक लाख करोड़ रुपये फूड सब्सिडी यानी खाद्य अनुदान पर खर्च हो जाएगा।

भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2020-21 में 30,42,230 करोड़ रुपये के व्यय का प्रस्ताव रखा है, जोकि 2019-20 के संशोधित अनुमान से 12.7 फीसदी अधिक है।

सरकार को अगर सारी फसलें खरीदनी पड़ेगी तो उसके भंडारण को लेकर भी मुश्किलें पैदा होंगी। वैसे भी सरकार के पास मौजूदा समय में ही भंडारण की व्यवस्था नहीं है। वह भंडारण के लिए भी किराए पर स्टोर लेती है।

सरदाना ने कहा कि एमएसपी अनिवार्य करने में एक फसल की क्वालिटी को लेकर भी मुश्किलें आएंगी क्योंकि यह तय करना होगा कि किस क्वालिटी का एमएसपी होगा और उससे कमजोर क्वालिटी का क्या रेट होगा और कौन खरीदेगा।

विजय सरदाना ने कहा, एमएसपी पर सारी फसलों की खरीद पर 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के लिए सरकार को सारे क्षेत्र में तीन गुना कर बढ़ाना पड़ेगा, जिसके बाद न तो निवेश आएगा और न निर्यात होगा और न ही रोजगार पैदा होगा। इसलिए एमएसपी की अनिवार्यता अव्यावहारिक मांग है।

प्रदर्शनकारी किसानों को नये कृषि कानून के बाद एमएसपी पर खरीद जारी रखने को लेकर आशंका है। इस पर खाद्य सचिव सुधांशु पांडेय का कहना है कि देश में जब तक सार्वजनिक विरतण प्रणाली रहेगी तब तक सरकार को एमएसपी पर अनाज खरीदना ही पड़ेगा, इसलिए यह आशंका निराधार है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि कानून से एमएसपी पर खरीद में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि एमएसपी खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है।

 

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