जानिए नई शिक्षा नीति – 2020, क्या-क्या होंगे बदलाव

BY – FIRE TIMES TEAM

नई शिक्षा नीति को कैबिनेट की मंजूरी के बाद बुधवार को केन्द्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और सूचना प्रसारण मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से इसके बारे में जानकारी दी। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पूरी जानकारी स्कूली शिक्षा सचिव अनिता करवाल और उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने दी। केन्द्रीय मंत्री निशंक ने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत के लिए मील का पत्थर साबित होगी।

करीब 34 वर्षों बाद शिक्षा नीति में कोई बड़ा बदलाव किया जा रहा है। 1986 में राजीव गांधी के कार्यकाल में शिक्षा नीति लागू की गई थी। इसके बाद 1992 में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में शिक्षा व्यवस्था में कुछ संशोधन जरूर किये गये थे। इसके अलांवा मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर पुनः शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया।

बीजेपी के घोषणापत्र में भी नई शिक्षा नीति को शामिल किया गया था। इसी के तहत केन्द्र सरकार ने 31 अक्टूबर 2015 को पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में पांच सदस्यों की समिति बनाई। समिति की रिपोर्ट 27 मई 2016 को आई। इसके पश्चात 24 जून, 2017 को सरकार ने इसरो के पूर्व प्रमुख के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में 9 सदस्यों की समिति नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए गठित की। 31 मई, 2019 को यह ड्राफ्ट केन्द्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को सौंपी गई। पूरे देश के 676 जिलों से सुझाव मांगे गये और 2 लाख सुझाव प्राप्त हुए। और आखिरकार 29 जुलाई, 2020 को प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नई शिक्षा नीति को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई।

नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों की रटने की प्रवृत्ति को समाप्त कर उनके अन्दर की प्रतिभा का विकास करना है। इस नीति में स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव किए गये हैं। प्राथमिक शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा या मातृभाषा रहेगी और इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

स्कूली शिक्षा कैसी होगी – 

बारहवीं तक की शिक्षा के लिए 5+3+3+4 का फार्मूला बनाया गया है। जिसमें बच्चा अपनी शुरूआती शिक्षा कक्षा 2 तक 5 वर्षों में पूरी करेगा। इसमें फाउंडेशन क्लास भी शामिल होगी। इसके बाद 3, 4, 5 की पढ़ाई 3 साल में पूरी करेगा और 6, 7 एवं 8वीं की पढ़ाई भी 3 वर्ष में पूर्ण करेगा। 9वीं से लेकर 12वीं तक 4 सालों में अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेगा।

इसमें नया बदलाव यह है कि साइंस और आर्ट्स को लेकर अब टेंशन नहीं होगी। विषयों को लेकर कैरिकुलर या एक्स्ट्रा कैरीकुलर मानने की झंझट नहीं होगी। सभी को समान महत्व दिया जायेगा। चाहे वह खेल का सब्जेक्ट हो या फिर फैशन डिजाइन का। स्कूली शिक्षा सचिव अनिता करवाल ने बताया कि बोर्ड परीक्षा का महत्व कम किया जायेगा। आम जीवन में घटित होने वाले विषयों पर सवालों को उठाया जायेगा। जिससे रट्टा मारना काम नहीं आयेगा।

रिपोर्ट कार्ड में भी बड़ा बदलाव हुआ है, छात्र का मूल्यांकन तीन तरह से होगा, पहला यह कि छात्र खुद अपना मूल्यांकन करेगा, दूसरा उसके सहपाठी भी उसका मूल्यांकन करेंगे और अंत में शिक्षक छात्र का मूल्यांकन करेंगे। इस बात पर विशेष जोर होगा कि जो भी छात्र स्कूलिंग पूरी करता है उसके पास कम से कम एक स्किल अवश्य हो। प्री से सेकेंडरी स्तर तक ग्रास इरोलमेंट रेशियो को 2030 तक 100 प्रतिशत करने का लक्ष्य है।

उच्च शिक्षा में क्या बदलेगा –

नई नीति के तहत उच्च शिक्षा पर खर्च को बढ़ाकर जीडीपी का 6 प्रतिशत किया जायेगा। अब तक शिक्षा पर केवल 4.43 प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। 2035 तक ग्रास इरोलमेंट रेशियो (जीईआर) को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य तय किया गया है। उच्च शिक्षा में अध्य्यनरत 18-23 आयु-वर्ग में जनसंख्या के अनुपात को जीईआर कहते हैं। 2017-18 में भारत का जीईआर 27.4 प्रतिशत था।

पहली बार मल्टी एन्ट्री और एग्जिट सिस्टम लागू किया जा रहा है। जिसमें यदि आपने ग्रेजुएशन 1 वर्ष करने के बाद किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाये तो आपको 1 वर्ष का सर्टिफिकेट मिल जायेगा, यदि दो साल पूरा कर लिया तो डिप्लोमा मिलेगा। और अगर पूरा कोर्स आपने कम्पलीट कर लिया तो आपको डिग्री मिल जायेगी।

अब पढ़ाई आप पर बोझ नहीं बनेगी, जैसी जरूरत वैसी पढ़ाई। रिसर्च वालों के लिए 4 साल का डिग्री प्रोग्राम, नौकरी वालों के लिए 3 साल का स्नातक। चार साल की डिग्री के बाद 1 साल का पोस्टग्रेजुएशन और फिर पीएचडी कर सकते हैं। एमफिल की जरूरत नहीं होगी।

अब अंडर-ग्रेजुएट प्रोग्राम 3-4 साल का और पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम 1-2 साल का होगा। इसके अलांवा इंटरमीडिएट के बाद 5 वर्ष का इंटीग्रेटेड ग्रेजुएट प्रोग्राम भी जारी रहेगा। एमफिल को समाप्त कर दिया जायेगा। कानून और मेडिकल को छोड़कर सभी के लिए पूरे देश में एक ही रेगुलेटर होगा। बाकी के रेगुलेटर इसके अन्तर्गत समाहित हो जायेंगे। सभी संस्थानों को प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता प्रदान की जायेगी।

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में रिसर्च के लिए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना की जायेगी। जो सभी को फंड उपलब्ध करायेगी। पालि, पाकृत और फारसी भाषाओं के लिए नेशनल इंस्टीट्युट की स्थापना की जायेगी।

 

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