प्रतीकात्मक चित्र

जैसे कटिया फंसाकर बिजली चोरी होती है, वैसे ही जी ग्रुप और रिपब्लिक ने प्रसार भारती का 52 करोड़ लूट लिया

BY – FIRE TIMES TEAM

डीडी फ्री डिश भारत सरकार की निःशुल्क-प्रसारण डीटीएच सेवा है। 2017 में इसके करीब 2 करोड़ 20 लाख उपभोक्ता थे जिनमे ज़्यादातर हिंदीभाषी, ग्रामीण इलाक़ों में थे।

इस माध्यम पर सीमित प्रसारण के लिए प्रसारणकर्ताओं को बोली लगानी पड़ती है और करोड़ो रुपये का शुल्क देना होता है। लेकिन ज़ी नेटवर्क और रिपब्लिक टीवी ने इस प्रक्रिया को चकमा देकर दर्शक बटोरने के लिए डीडी फ्री डिश का प्रयोग किया।

साल 2017 मे रिपब्लिक टीवी का दूरदर्शन की डीटीएच सर्विस डीडी फ्री डिश पर 31 अन्य चैनलों के साथ प्रसारण शुरू हुआ। यह सरकारी प्रसारणकर्ता और डीडी की संचालक संस्था प्रसार भारती के नियमों के विरुद्ध था।

सीधे-सीधे कहें तो इन 32 चैनलों ने ग़ैर-कानूनी तरीके से एक सार्वजनिक डीटीएच सुविधा का दोहन किया. ऐसा ज़ी समूह की डीटीएच सर्विस डिश टीवी की सहायता से किया गया। इन 32 चैनलों में आधा दर्ज़न से भी अधिक चैनल ज़ी समूह के ही थे।

यह घोटाला केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय की नज़र में भी आया, जो कि तब वर्तमान उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के अधीन था। मंत्रालय ने इसकी सूचना दूरदर्शन को दी और डिश टीवी से भी रिपब्लिक के द्वारा डीडी फ्री डिश के ‘अनाधिकृत प्रयोग’ पर सफाई मांगी।

मंत्रालय को दिए जवाब में दूरदर्शन ने डिश टीवी और रिपब्लिक टीवी पर प्रतिस्पर्धा कम करने और डीडी फ्री डिश के स्लॉट्स की नीलामी के उद्देश्य को विफल करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की।

डीडी फ्री डिश का स्लॉट पाने की प्रक्रिया बेहद सरल है। इस बाबत सरकार ने 2011 मे दिशा-निर्देश जारी किए थे। प्रसार भारती उसकी डीटीएच सेवा का उपयोग करने के इच्छुक निजी चैनलों के लिए ई-ऑक्शन की घोषणा करता है। ई-ऑक्शन के अंतर्गत उपलब्ध स्लॉट्स या बकेट्स की नीलामी होती है।

हिंदी मनोरंजन के चैनल सबसे मंहगे होते हैं, उनके बाद हिंदी फिल्म, हिंदी और भोजपुरी संगीत और खेल, और फिर हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी न्यूज़ चैनल आते हैं। 54 स्लॉट्स की नीलामी होती है जो कि बेहद मंहगे बिकते हैं।

इस साल फरवरी में हुए दूसरे सालाना ई-ऑक्शन में न्यूज़ चैनलों ने 13 फ्री डिश स्लॉट्स, औसतन 10.85 करोड़ रुपए प्रति स्लॉट की दर से खरीदे।

हांलाकि न्यूज़ श्रेणी में एक स्लॉट का रिजर्व मूल्य सात करोड़ रुपये था, फिर भी सबसे अधिक बोली 12.25 करोड़ रुपयों की लगी थी। लेकिन इस प्रक्रिया को चकमा देने और करोड़ो रुपए बचाने का एक तरीका है।

एक तकनीकी हेर-फेर से डिश टीवी किसी चैनल को फ्री डिश पर निःशुल्क उपलब्ध करवा सकता है।

सरकारी डीटीएच सेवा अपने लाखों उपभोक्ताओं को कुछ फ्री-टू-एयर चैनल उपलब्ध करवाती है जिस से उन्हें डीडी का नियमित सदस्यता शुल्क न देना पड़े।

जबकि 2001 के डीटीएच दिशानिर्देशों के अनुसार निजी डीटीएच ऑपरेटर ऐसा नहीं कर सकते। इसका मतलब डिश टीवी या किसी भी निजी डीटीएच सेवा पर सभी चैनल अनिवार्य रूप से ‘एन्क्रिप्टेड’ रहते हैं।

‘अपलिंकिंग गाइडलाइन्स’ के अनुसार भी चैनल ‘एन्क्रिप्टेड’ रूप में रहने चाहिए जो केवल कुछ ही उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो।

लेकिन फ्री डिश और डिश टीवी के उपग्रहों की स्थिति ने इसमें एक ऐसी गड़बड़ी पैदा कर दी है जिस से यदि डिश टीवी पर ‘अनएन्क्रिप्टेड’ चैनल उप्ब्लब्ध हों तो वह फ्री डिश पर भी बिना कोई स्लॉट खरीदे प्रसारित किए जा सकते हैं।

न्यूजलान्ड्री की एक रिपोर्ट के मुताबिक 18 मई 2017 को सूचना प्रसारण मंत्रालय ने डिश टीवी को लिखा। ‘रिपब्लिक टीवी के डीडी फ्री डिश पर अनाधिकृत रूप से उपलब्ध होने की बात मंत्रालय के सामने आई है’, प्रसारण नीति और विधान के उपसचिव मनोज कुमार निर्भीक ने पत्र में लिखा। ‘मंत्रालय इस मामले की जांच कर रहा है।’

निर्भीक ने इस ओर इशारा किया कि डिश टीवी दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहा है और यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या डिश टीवी पर कोई ‘अनएन्क्रिप्टेड’ चैनल भी उपलब्ध है।

22 मई को डिश टीवी ने जवाब देने के लिए दो हफ़्तों का समय मांगा। लेकिन मंत्रालय के जून और जुलाई में दो-दो बार पुनः पूछे जाने पर भी डिश टीवी ने कोई जवाब नहीं दिया।

डिश टीवी के एक प्रवक्ता ने बताया कि उन्होंने कोई ‘अनएन्क्रिप्टेड’ चैनल अपलिंक नहीं किए और इस बारे में मंत्रालय को नवम्बर 2017 में सूचित कर दिया गया था। जबकि मंत्रालय और दूरदर्शन की बातचीत कुछ और ही कहानी कहती है।

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