कफनचोरों ने कोरोना को बनाया भ्रष्टाचार करो ना !

BY- बादल सरोज 

कार्पोरेटी हिन्दुत्व की राजनीतिक भुजा भाजपा की एक और विशेषता उसकी निर्लज्ज दीदादिलेरी है। जिसके बारे में कोई सोच तक नहीं सकता, ऐसे असाधारण और असामान्य आपराधिक कारनामे यह बिना पलक झपकाये धड़ल्ले से अंजाम दे जाती है।

कोविद-19 की महामारी के तेजी से बढ़ने के ठीक बीचोंबीच बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार इसी की एक मिसाल है। पूरी धृष्टता और किसी भी तरह की शर्म किये बिना, अंगरेजी मुहावरे में कहें तो किलर इन्स्टिंक्ट के साथ भ्रष्टाचार जारी है।

कथित मुख्यधारा मीडिया की सहभागिता और सुप्रीम कही जाने वाली अदालतों की सहृदयी सदाशयता के बाद तो लगता है जैसे कोरोना को इन्होने “भ्रष्टाचार करो ना” जैसा अनुरोध मान लिया है।

वैसे तो कोरोना आपदा से नहीं निबटने, उसे पहले हवाई अड्डों पर जांच न करके, फिर नमस्ते ट्रम्प के लिए पूरे दो महीने बर्बाद करके और अब भी जांचों की व्यवस्था न करके महामारी के रूप में फैलने देने की मोदी सरकार की हरकतें ही किसी बड़े स्कैंडल से कम नहीं हैं। मगर इसके बाद भी शायद ही कोई काम या घोषणा या भाषण ऐसा हो जिसके जरिये कमाई करने और करवाने का नया माध्यम न ढूंढा गया हो।

गुजरात में नकली वेंटिलेटर्स का घोटाला ताजा उदाहरण है। कहते हैं कि जिस व्यवसायी ने ओबामा की भारत यात्रा के वक़्त मोदी को धागे-धागे पर उनका नाम लिखे कपड़े का सूट पहनाया था, उसी परिवार की कंपनी ने फर्जी वेंटीलेटर का यह टोपा गुजरात सरकार को पहनाया है।

अपुष्ट खबर तो यह भी है कि इसके लिए उन्हें मोदी द्वारा बनाये गए प्राइवेट लिमिटेड पीएम केयर फण्ड में से पैसा भी दिया गया ताकि देश बने चाहें न बने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

बिना डीसीजीआई के लाइसेंस के बना और 1000 की तादाद में सप्लाई होने वाला यह धमन-1 हाँथ से हवा भरने वाले अम्बू बैग जैसी चीज निकला। अपने अपनों को कमाई करवाने वाली सरकार भी कमाई से नहीं चूक रही है। एन-95 का जो मास्क 49 रुपये 61 पैसे में खरीदा गया, उसे 65 रुपये में बेचा जा रहा है।

खून में व्यापार होने का दावा करने वाले स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा अपने सहोदरों और अवतारियों को आत्मनिर्भर बनाने का यह अकेला कारनामा नहीं है। चीन से लाई गयी रैपिड टैस्ट किट का घोटाला इसके साथ है। चीन से इसे साढ़े बारह करोड़ में खरीदा गया, दूसरे को 20 करोड़ में टिकाया गया और उसने तीसरे यानि सरकार को 30 करोड़ में टेप दिया।

यह पहला और दूसरा कौन है, यह सवाल धूमिल की कविता की तरह मुखर मौन नहीं है, स्पष्ट है। ये उसी कुनबे के व्यापारी और दलाल हैं जो टेस्टिंग किट से भी मालामाल होने थे। फिलहाल पोल खुल गयी तो अभी सौदा टल गया।

मौतों की कीमत पर हो रही कमाई की इस वैतरणी में डुबकी लगाने लाला रामदेव भी कूद पड़े और स्काइप या ऐसे ही किसी माध्यम से म.प्र. के मुख्यमंत्री व्यापम अनुभवी शिवराज सिंह चौहान के साथ अपनी फार्मेसी की “कोरोना की दवाइयों” के परीक्षण का सौदा कर लिया।

सीएम हाउस से फोन गया तो बिना आईसीएमआर के क्लियरेंस की परवाह किये बिना अपने दिमाग का इस्तेमाल किये कोरोना से बजबजाते इंदौर के संक्रमितों और संभावित संक्रमितों पर इनके उपयोग – ड्रग ट्रायल्स – की अनुमति वहां के कलेक्टर ने दे भी दी।

प्रदेश के नागरिकों और सीपीएम आदि राजनीतिक दलों ने जोरदार विरोध किया तो फिलहाल यह सौदा टल गया है। मगर लाला रामदेव अपनी सैकड़ों करोड़ की दवाइयों को खपाये बिना मानेंगे नहीं।

इसी तरह का घोटाला कोरोना संक्रमितों का “इलाज” कर रहे चुनिंदा निजी अस्पतालों में हर मरीज के पांच-साढ़े पांच लाख रुपयों के बिल का है। मुम्बई के सरकारी होटल को बेचे जाने के समय अरुण शौरी के बारे में पूर्व भाजपाई मंत्री राम जेठमलानी द्वारा कहे गए शब्दों में कहें तो “यदि इसकी जानकारी सरकार के लोगों को नहीं है, तो वे नालायक हैं और यदि इसमें उनका हिस्सा नहीं है तो वे बेवक़ूफ़ हैं।” भाजपाई और शिवराज सिंह बाकी जो हों सो हों, ऐसे मामलों में नालायक या बेवक़ूफ़ तो कतई नहीं हैं।

कोरोना लॉकडाउन के दौरान भूखों को राहत और राशन के वितरण का घोटाला तो एक महा-घोटाला बनता जा रहा है। दस किलो आटे के पैकेट्स में सात आठ किलो आटा देने वाले उद्यमी के घोटाले की खबर उसके द्वारा पीएम केयर फण्ड में “दान” देने के दानवीर अवतार की खबर के साथ छपती है जो बाकी अनकहा कह जाती है।

हर रोज किसी न किसी भाजपाई के घर से राहत के लिए आये खाद्यान्न की बीसियों से सैकड़ों तक बोरियां जब्त किये जाने की खबरें असली घोटाले की हांडी का एक चावल भर हैं।

बेईमानी इतने धड़ल्ले से की जा रही है कि 20 लाख करोड़ के पैकेज की पांच दिन तक लगातार साढ़े सात घंटे बोलकर परत-दर-परत छीलते हुए जनता को ठेंगा देने वाली प्याज न खाने वाली वित्तमन्त्राणी बाँटी जा चुकी राहत के इतने काल्पनिक दावे कर गयीं कि अब उन्हें लपेटना उन्ही के महकमे के लिए मुश्किल हो रहा है। बेचारे “सार पर जाइये डिटेल्स पर नहीं” का ज्ञान बाँटते हुए अपनी झेंप छुपाने में लगे हैं।

प्रवासियों की वापसी की रेलों का “जाना था जापान पहुँच गए चीन” होकर रास्ता भटक जाना, इन रेलों में बैठे यात्रियों को दिए जाने वाले खाने और पानी का गायब हो जाना, हजारों निजी बसों का बिना चले ही सलामत वापसी का रिकॉर्ड तैयार हो जाना घोटालों का एक और आयाम है।

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लगता है प्रधानमंत्री अपने भाषण में महामारी को अवसर बनाने की जो सलाह दे रहे थे, वह इन्हीं धनपशुओं के लिए, इन्हीं को अवसर देने की बात थी।

जागते रहना, हुंकारते रहना ही इन भ्रष्टाचारों को रोकने का एकमात्र उपाय है। ठीक यही काम था जो इस गुजरे सप्ताह में पहले 22 मई को देश भर के श्रमिक-कर्मचारी संगठनों ने और उसके बाद 27 मई को दो सौ से अधिक किसान संगठनों के साझे मंच अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आव्हान पर किया गया।

जिसे राजनीतिक मंच पर एकजुट करने की एक बड़ी कोशिश कोविद-19 पर समान विचार वाले विपक्षी दलों के एक साझा घोषणापत्र के जरिये की गयी। रास्ता यही है। कोविद की महामारी से भी और लूट की महामारी से भी इसी रास्ते पर चलकर बचा जा सकता है।

लेखक भोपाल से प्रकाशित पाक्षिक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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