अपनी ही उगाई फसल की कीमत के लिए डंडे खाता किसान

BY- पुनीत सम्यक

जो पीढ़ी गांवों में पैदा हुई है वहीं पली बढ़ी है, पर आज किसी कारणवश शहरों में रह रही है, उसे याद होगा कि उन्होंने सेर भर गेंहूँ के बदले क्या कुछ नही ख़रीदा है।

एक सेर गेंहूँ के बदले तीन सेर मूली, चार सेर खीरा ककड़ी, दो सेर मक्का, पाव भर सरसो तेल, दूध, बनियान, चप्पल, अंडे सबकुछ।

सुबह-सुबह गांवों में जिस किसान के साइकिल पर सब्ज़ियां लदी होती थीं, वो शाम होते होते एक मन गेंहूँ में बदल जाती थीं। सुबह को आइसक्रीम बेचने निकला इंसान जब गांव से बाहर निकलता था तो उसके पास दसियों छोटे छोटे थैले होते थे। किसी में गेहूं भरा होता था तो किसी में धान। किसी में मक्का भरा होता था तो किसी में आटा। जिस धुन में पों पों बजाते हुए आया था, उसी धुन में बजाते हुए वापस भी जाता था।

भिखारी भी गांव में खाली हाथ एंट्री मारता था और जब शाम को लौटता था तो उसे अपना आधा सामान किसी के यहाँ बेच देना पड़ता था। क्योंकि दिन ढलने के साथ साथ उसके कंधे पर लटके थैलों का वजन बढ़ता जाता था।

बीवी की जिद है कि आज बाजार जाओ, सावन चढ़ रहा है, मेरे लिए हरी हरी चूड़ी, टिकुली, सेनुर, साड़ी-सब लेकर आओ। पति के पास पैसे नहीं हैं! कोई बात नहीं। बखार में गेंहू तो है न।

बाजार में घुसने से पहले ही अलग अलग अनाजों के आढ़ती कतारों में बैठे हैं। उसने मात्र एक मन गेंहू बेचा। सारे सामान लिए और ख़ुशी ख़ुशी घर चला आया। घर में यदि अनाज है तो मेले, हाट, त्योहारों के बारे में सोचने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

हमें आज भी याद है बचपन में दिवाली कैसे मनाते थे? स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में धानों की लटकी बालियां सुरुक कर टिफिन में भर लाते थे। दिवाली आते आते तीन-चार किलो हो जाता था। फिर घर से कुछ और धान मिलाकर अपने लिए पटाखे, मिट्टी के खिलौने और ढेर सारी खुशियां खरीद लेते थे।

इन छोटी छोटी खुशियों को छीना कॉर्पोरेट ने, उस कॉर्पोरेट ने जो राजनीतिक दलों को मोटा चंदा देता है वह भी अदृश्य होकर। कोई भी दल ये बताने को तैयार नहीं है कि उसको अरबों रुपये चंदे दे देने वाली अदृश्य शक्ति कौन है।

आज किसान जो सड़कों पर हैं तो इसके पीछे यही कारण है। भौतिक वस्तुओं के दामों की तुलना में समय के साथ उनकी उपज का दाम कम होता गया।

चूँकि किसान के पास राजनीतिक पार्टी को देने के लिए मोटा चंदा नहीं है, इसीलिये वह अपने गेंहूँ के #न्यूनतम_समर्थन_मूल्य को बढ़ाये जाने के लिए कभी अनशन करता है तो कभी रोड पर जुलुस निकालता है। डंडे खाता है तो कभी सैकड़ों किलोमीटर लंबा सड़क मार्च करता है। और जब कोई सुनवाई नहीं होती है तो अंततः फांसी लगा लेता है।

वही दूसरी ओर, कॉर्पोरेट किसानों की उपज को सरकारी मूल्य पर खरीदता है और वहां अपना प्राइसटैग टांग देता है, जो सरकारी मूल्य से लगभग ढाई गुना ज्यादा है। उसे कहीं चक्का जाम करने की जरूरत नहीं है। कहीं लाठी खाने की जरूरत नहीं है। कोई फांसी लगाने की जरूरत नहीं है।

खेत किसान का, मिट्टी किसान की, गेंहूँ का बीज किसान का, खून-पसीना किसान का। कॉर्पोरेट से सिर्फ केमिकल फ़र्टिलाइज़र मिलता है किसान को। उसका दाम कॉर्पोरेट हर साल खुद बढ़ा लेता है। लेकिन किसान अपनी ही पैदावार का दाम नहीं बढ़ा सकता। ये भी उसी निर्दयी कॉर्पोरेट के हाथों में है।

यदि सरकार किसानों को गेंहूँ की कीमत प्रति किलो 46 न सही 30 रूपये ही दे दे तो किसानों की ये आत्महत्याएं रुक जायेंगीं। उनके बच्चे पढ़ लिख लेंगे। शहरों में धक्के नहीं खाएंगे। फुटपाथों पर नहीं सोयेंगे।

यहाँ जो दाम लिखा है वह अधिकतम खुदरा मूल्य है और किसान जिस बात के लिए लाठी खा रहा है, वाटर कैनन झेल रहा है वह न्यूनतम समर्थन मूल्य है।

किसान की लड़ाई इसी कल्चर के खिलाफ है। फिर सरकार बीच में क्यों आ रही है? किसान अपनी औकात पर आ गया तो सबके लाले लग जायेंगे। किसी बिग बाजार में इतना दम नही है कि वह गेंहू का चार दाना तक उगा दे!!

(उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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