भारत की जनता को इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट देने से उनके असली लक्ष्य मनु के ब्राह्मणवाद पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा

BY : बादल सरोज

“ज्यों-ज्यों दिन की बात की गयी, त्यों-त्यों तो रात हुयी” की तर्ज पर पिछले चार दिनों में दो बड़ी और चिंताजनक घटनाएं घटी हैं।

पहली : असम और मिजोरम की “सीमा” पर दोनों प्रदेशों (देशों नहीं, प्रदेशों) के सशस्त्र बलों में मुठभेड़ हो गयी। मेघालय के मुख्यमंत्री के मुताबिक़ असम ने एक आईजी पुलिस की अगुआई में “उनके” मेघालय की सीमा में घुसकर जमीन कब्जाने के इरादे से धावा बोला था।

असम के मुख्यमंत्री के अनुसार, मेघालय के सशस्त्र बल ने युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली लाइट मशीनगनों से “उनकी” पुलिस पर हमला किया, जिसमें कोई 5 सिपाही मारे गए, एक एसपी की टाँग में गोली लगी और 500 घायल हो गए। उन्होंने “हमारे सैनिकों की शहादतें व्यर्थ नहीं जायेंगी और (दुश्मन को) एक इंच जमीन नहीं दी जाएगी” का सीना ठोंक बयान भी झाड़ दिया।

असम के मुख्यमंत्री भाजपा के हैं, बाकी उत्तरपूर्व के प्रदेशों में भी सीधे या पिछवाड़े से भाजपा की या उसकी नियंत्रित सरकारें हैं। बात इतनी भर नहीं है। इस असाधारण जंग के दो और चौंकाने वाले पहलू हैं।

असम का सशस्त्र बल जिस चौकी को लांघ कर गया था, वहां केंद्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ तैनात है और एक दिन पहले ही भाजपा नेतृत्व की गिनती जहां पूरी हो जाती है, उस दो नंबर के नेता गृहमंत्री अमित शाह पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक करके लौटे हैं।

दूसरी : कर्नाटक के सारे लिंगायत मठों के मठाधीश बैंगलोर में इकट्ठा होते हैं। धर्म से जुड़े किसी पहलू पर मंथन करने के लिए नहीं, नामी मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा को बचाने के लिए!! भगवाधारी ये संत स्वयंभू हिन्दू पार्टी को चेतावनी देते हैं कि यदि लिंगायत येदियुरप्पा को हटाया, तो सर्वनाश कर दिया जाएगा।

यह दोनों घटनाएं विग्रह और विभाजनों के विस्फोट की ताज़ी धमक हैं। नफ़रत और फूट डालने के योजनाबद्ध प्रयासों की क्रिटिकलिटी की वह लड़ी है, जो हिन्दू-मुसलमान की चिंगारी दिखाकर सुलगाई गयी थी, मगर सुलग गयी है तो सिर्फ वही तक नहीं रुकने वाली।

क्योंकि नफ़रत, बस नफरत होती है, दुश्मन की तलाश में पागल और उन्मादी, बाहर न बचे तो घर में ही ढूंढ लेती है शिकार। मौजूदा सत्ता गिरोह का आधार हिंदुत्व इस विभाजन का प्रस्थान बिंदु है। होना भी था इसकी इमारत ही द्वेष और विभाजन पर टिकी है। यह हिन्दुओं को एकजुट करने वाला नहीं है, उनके अलग-अलग विभाजनों को मजबूत सीमेंट से और पुख्ता करके उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने वाला है।

ऐसा होना ही था। विभाजन ही हिंदुत्व का गुणसूत्र है। इसकी धारणा ही दोषपूर्ण है क्योंकि वह समावेश पर नहीं, मनु के दिए पारस्परिक निष्कासन पर आधारित है। उस पर से इसका उपयोग हिन्दू समाज में व्याप्त रूढ़ियों या कुरीतियों के विरुद्ध सुधार आंदोलन चलाने के लिए नहीं है।

उनका घोषित कार्यक्रम है जड़ता का सुदृढ़ीकरण ; शास्त्रोक्त दमन का शस्त्रीकरण। उसे यथावत रखना बीच में आ गयी थोड़ी बहुत ढिलाई को भी कस बांधकर दुरुस्त करना।

यह काम किस तरह से किया जा रहा, यह नंगी आँखों से देखा जा सकता है। जहां-जहां इनकी सरकारें रहीं या हैं, वहां-वहां वे सिर्फ अल्पसंख्यकों पर ही नहीं टूटे, महिलाओं के प्रति, वंचितों और गरीबों के प्रति, दलितों और आदिवासियों के प्रति अपनी हिकारत और नफरत अपनी नीतियों से अमल में लाई।

पूरी कोरोना महामारी में यह और भी तीव्रता तक पहुँची। इनके बड़े-बड़े नेताओं-नेत्रियों को किसानों, मजदूरों के प्रति लगभग गालीगलौज की भाषा का इस्तेमाल करने में भी लाज नहीं आयी।

इनकी एकता, असल में विग्रहों और विभाजनों को धो-पोंछकर, पैना करके एक-दूसरे के खिलाफ खड़े कर देने की एकता है। असम-मेघालय भिड़ंत के दिन नरेंद्र मोदी जिस भारत जोड़ो आंदोलन का सुर्रा छोड़ रहे थे, वह 1942 में ‘भारत छोडो’ आंदोलन के संघर्ष के दौरान बनी समूचे देश की एकता को खंड खंड कर देने के अभियान का ही दूसरा नाम था।

कर्नाटक में लिंगायत साधू संतों का इकट्ठा होना उसी राजनीति का विस्तार है, जिसे सत्ता में पहुँचने और बने रहने के लिए आरएसएस के निर्देशन पर भाजपा ने आजमाया है और सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया है।

कुछ महीनों बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पटेलों के लिए अलग, तो निषादों के लिए अलग गठबंधन बनाने के नाम पर यह शुरू हो चुकी है। अभी तो आगाज़ हुआ है, जाति समूहों से होती-होती धीरे-धीरे यह गोत्रों तक पहुँच जाए, तो ताज्जुब नहीं होगा।

यूपी का पिछ्ला चुनाव ही भाजपा ने यादवों और जाटवों के खिलाफ बाकियों को इकठ्ठा करने की चतुराई दिखाकर लड़ा था। हरियाणा की चौसर पर जाट विरुद्ध अन्य की बिसात बिछाकर वे दिखा चुके हैं। बिहार में भी भाजपा इसी तरह का करतब दिखाती रही है।

भारत की जनता को इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट देने से उनके असली लक्ष्य मनु के ब्राह्मणवाद पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा बल्कि नीचे जितना ज्यादा विभाजन होगा, ऊपर की मलाई उतनी तर होगी।

इस सबके बीच ध्यान बंटाने के लिए समय-समय पर जुमले भी छोड़े जाते हैं मगर असलियत का बदरंग इतना गाढ़ा है कि रंगे सियार की कहानी में बताये समय से पहले ही उतर जाता है। ऐसा ही एक जुमला आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत का था।

उन्होंने फ़रमाया कि हिन्दू, मुसलमान एक ही हैं, उनका डीएनए भी एक है। मगर दो दिन में ही उनके सुर उलट गए और अपने ही डीएनए वाले मुसलमानों की कथित बढ़ती आबादी के फर्जी आंकड़े गिनाते हुए अनेकानेक खतरे बताने लगे।

इन सब धतकरमों के जोखिम कितने भारी हैं, इस बात को वे ही समझ सकते हैं, जिन्हे भारत के भूगोल के इतिहास और उसके एक राजनीतिक इकाई बनने के पीछे की केमिस्ट्री का ज़रा सा भी ज्ञान होगा। जिन्होंने पिछले तीन-चार दशकों के अंतर्राष्ट्रीय घटना विकासों को भारत के नजरिये से देखने की कोशिश की होगी।

इसे वे ही समझ सकते हैं, जो साम्राज्यवाद और उसके भारत विरोधी ग्रांडप्लान को जानते हैं। जिन्होंने 70-80 के दशक में सामने आये पेंटागन और सीआईए के कुटिल षडयंत्र प्रोजेक्ट ब्रह्मपुत्र को पढ़ा है।

विश्व के दुष्ट राज्य इजरायल के अस्तबल में बंधे यूनानी पौराणिक गाथाओं के घोड़े पेगासस के जरिये भारतीयों की जासूसी करके खुद देश के सुरक्षा तंत्र में भीतर तक घुसपैठ कराने वाले संघियों या भाजपाईयों से इस सबके जानने-समझने की उम्मीद करना सरासर असंभव है। वे इसका प्रतिलोम और निषेध है ठीक इसीलिए यह सब और ज्यादा चिंता पैदा करता है।

मायावती की तरह ब्राह्मणों, ठाकुरों और इत्यादियों के सम्मेलन करके या कोई 50 साल पुराने 172 किलोमीटर के सीमा विवाद में इधर असम और उधर मेघालय के मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाकर इस विभाजन और विग्रह की आग में घी ही डाला जा सकता है।

इसे बुझाने के सबक स्वतंत्रता आंदोलन द्वारा उकेरी गयी इबारतों में हैं, देश के संघीय ढाँचे को संघियों के हाथ टूटने से बचाने में हैं। जातियों की मोर्चाबंदी में नहीं, उनसे ऊपर उठकर असली मुद्दों के इर्द-गिर्द मेहनतकश भारतीयों की लामबंदी में हैं।

कारपोरेट के मुनाफों की ढुलाई में लगे भारवाहक और मनु की बहाली के लिए उत्सुक निशाचर यह काम नहीं कर सकते। वे हर संभव कोशिश करेंगे कि दूसरे भी यह काम न कर सकें। मगर जैसा कि कहा जाता है : इतिहास हादसों के नहीं, निर्माणों के होते हैं।

भारत की जनता भी विध्वंस और विनाश, विग्रह और विभाजन के विरुद्ध डटी है, डटेगी। संसद भवन से कुछ सौ मीटर की दूरी पर हर रोज अपनी संसद लगा रहे किसानों ने इसे उदाहरण के रूप में दिखाया है। लखनऊ जाकर अपने मिशन उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड का एलान कर इसे और आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया है।

लेखक पाक्षिक ‘लोकजतन’ के संपादक और अ. भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं।

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