क्या बंगाल में सिर्फ ध्रुवीकरण करके ही चुनाव जीत सकती है BJP?

BY- सलमान अली

बंगाल चुनाव में अब 6 महीने से भी कम समय बचा है। राजनीतिक पार्टियां अभी से वोटर को अपनी ओर खींचने के लिए फिराक में लग गई हैं।

राजनीति में क्योंकि सत्ता ही सबकुछ है इसलिए इसे पाने के लिए नेता किसी भी स्तर तक चले जाते हैं। अब यह बंगाल चुनाव जीतने के लिए भी किया जाएगा।

बंगाल में कुल 294 विधानसभा की सीटें हैं। 2016 में अकेले तृणमूल कांग्रेस ने 222 सीटें जीतकर पूरा चुनाव स्वीप कर दिया था। इसके अलावा कांग्रेस के पास 19, बीजेपी के पास 16 व सीपीआई(मार्क्सवादी) के पास 19 सीटें हैं।

चुनाव परिणाम के बाद 2016 में एक बार फिर ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। ऐसा पाया गया कि ममता बनर्जी को मत सिर्फ एक सम्प्रदाय या एक जाति से नहीं मिले बल्कि सभी ने दिया। फिर भी इनमें सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बंगाल के मुसलमानों का था।

बंगाल के मुसलमान पहले कम्युनिस्ट पार्टी व कांग्रेस को भी वोट करते रहे हैं लेकिन पिछले दो चुनावों में वह ममता के पक्ष में पूरी तरह से झुक गए हैं।

यही वजह भी है कि ममता खुलकर मुसलमानों का समर्थन भी करती हैं चाहे वह सीएए हो या एनआरसी। बंगाल ने एनआरसी का जमकर विरोध भी किया।

इसी मुद्दे पर भाजपा ममता के जैसे ही बंगाल में काम कर रही है फर्क बस इतना है कि वह एक बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को भुलाकर अन्य की ही बात करना चाहती है।

इसका फायदा 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हुआ भी। ध्रुवीकरण की राजनीति और ममता बनर्जी का विरोध करके भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीट जीतने में कामयाब हो गई। तब उसे कुल 40 प्रतिशत वोट मिला था।

आप समझ सकते हैं कि जिस पार्टी को 5 प्रतिशत भी वोट न मिलता हो वह 40 प्रतिशत के आंकड़े पर एकदम से पहुंच जाए, उसने क्या किया होगा।

दरअसल बीजेपी का जो आधार है उसी पर उसने फोकस करके बंगाल चुनाव में फायदा लिया। जिस तरह वह देश में एक समय दो सीट भी नहीं जीत पा रही थी और ध्रुवीकरण करके इस मुकाम तक आ गई। उसी तरह से वह बंगाल में पैर पसार रही है।

बंगाल में जिस तेजी के साथ बीजेपी ध्रुवीकरण कर रही है वह उसे देश वाली स्थिति बंगाल में प्रदान कर दे इसमें कोई संकोच नहीं। उसपर दो चांद लगाने ओवैसी साहब की पार्टी भी आ रही है।

photo/twitter

मतलब अब भाजपा को ध्रुवीकरण करने में और आसानी होगी या फिर पूरा मैच ही उसके पक्ष में हो जाएगा। इसकी चिंता ममता बनर्जी के चेहरे पर साफ देखी भी जा सकती है।

बंगाल में लोगों के पास बीजेपी के रूप में एक नया विकल्प है। इससे पहले वह कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस को भी देख चुके हैं। पिछले 10 साल से वह ममता बनर्जी को भी देख रहे हैं।

इसका फायदा बीजेपी किसी रूप में छोड़ना नहीं चाहेगी। और उन मुद्दों पर बात बिल्कुल नहीं करना चाहेगी जिसपर वह खुद फंस सकती है। इसमें बेरोजगारी, आर्थिक विकास पर तो बिल्कुक नहीं।

वह छात्रों, किसानों और मजदूरों के मुद्दे भी नहीं उठायेगी। ध्रुवीकरण के अलावा सिर्फ कानून व्यवस्था पर ही बीजेपी मुद्दा बनाएगी। या यूं कहें कि बीजेपी ने काफी पहले से शुरू भी कर दिया है।

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इस साल बंगाल में 1 जून के बाद से दो दर्जन से ज्यादा राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई हैं। इसके अलावा कई लोगों पर जानलेवा हमले भी।

इस मुद्दे को वह भुनाना शुरू कर चुकी है और काफी हद तक सही दिशा भी मिली हुई है। इसके अलावा राज्य के राज्यपाल भी ममता बनर्जी से कानून व्यवस्था को लेकर सवाल करने लगे हैं।

कानून व्यवस्था में भी एक तरह से ध्रुवीकरण करके ही बीजेपी आगे फैला रही है। वह इन हत्याओं को ऐसे प्रचार कर रही है जैसे हत्याएं सिर्फ एक ही समुदाय के लोगों की हो रही हैं।

कुल मिलाकर यदि बीजेपी को बंगाल में चुनाव जीतना है तो उसके पास ध्रुवीकरण के अलावा कोई मुद्दा नहीं है। यह चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका भी।

वह एनआरसी और सीएए के माध्यम से गैर मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में करने की फिराक में है। ऐसा 2019 के चुनाव में हुआ भी था। अब यदि लोकसभा चुनाव में मिले वोट से 5 प्रतिशत भी ज्यादा वोट मिले तो पूरी बाज़ी बंगाल की पलट जाएगी।

 

 

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