हमारा सभ्य समाज और गालियां

BY- आरती रानी प्रजापति

भाषा मनुष्य की एक जरूरत है। हम भाषा के बिना किसी से संपर्क नहीं कर सकते। भाषा प्रतीकों में हो, लिखित हो, मौखिक हो या दृश्य, भाषा होनी चाहिए। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। लेकिन आज के समय में भाषा गाली देने का माध्यम बन चुकी है।

गालियां जिन्हें आज के युवा भी बड़ी सरलता से कह जाते हैं। गालियां हमारे रोज का हिस्सा बन गई हैं। गालियों के बिना आज इंसान खुद को अधूरा मानता है। यहां मैं भारतीय संदर्भों में बात कर रही हूं।

लोग आमतौर पर गालियों के संदर्भ में कहते मिल जाते हैं कि यह हमारे कहने का तरीका है। इसके बिना हम बात नहीं कर सकते। सरकारी दफ्तर में अक्सर कर्मचारी गाली खाते हैं तो प्राइवेट में कर्मचारी अपने साथी कर्मचारी से गाली में बात करते हैं।

यह इतना सरल सहज बना दिया गया है कि उन्हें गलत भी नहीं लगता। गाली देने को लोग बोल्ड होने से भी जोड़ देते हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कि आज पढ़ी-लिखी महिला भी गाली देती मिल जाएगी ।

गालियां बनी किस पर हैं? कभी हमने यह सोचा है? गालियां जिसे हम बड़ी सरलता-सहजता से बोल देते हैं, वो किस वर्ग पर बनी हैं? कौन है वह लोग जो कभी भी चाहे हम खाने की टेबल पर हो या चाय की दुकान पर, सिगरेट पी रहे हो या ऑनलाइन-ऑफलाइन कोई काम कर रहे हों, हमारी जबान पर सहजता से आ जाते हैं। जिन्हें अपने बीच लाते हुए हमें कोई अपराध बोध महसूस नहीं होता, बल्कि गर्व होता है, ठंडक मिलती है, मन की भड़ास निकल जाने की।

गालियां जिन पर बनी है वे इस समाज के वो लोग हैं जिन्हें समाज नीची नजर से देखता है। भारतीय समाज ब्राह्मणवादी पुरुषसत्तात्मक है।

ऐसे में उसने हमेशा औरतों, दलित, आदिवासी, गरीब, मजदूर, कमजोर, अक्षम, समाज के तथाकथित नियम कानून ना मानने वाले लोगों को अपना शिकार बनाया है। उन्हें इस तरह से बेइज्जत करने की कोशिश की है। उसमें से ही एक प्रकार है गाली।

जब आप ध्यान से सोचते हैं तो पाते हैं अधिकतर गालियां औरत पर बनी है। मादरचोद, बहनचोद, चूतिया, हरामी, साला ,साली, बेटीचोद इस शब्दों को ध्यान से देखें तो यह औरत से निर्मित शब्द है यह शब्द ऐसे हैं जिन्हें आप बात बात पर प्रयोग करके खुद को प्रगतिशील साबित करते हैं । लोग सरलता से कह देते हैं कि हमारी आदत है गाली देना। मैं बिना गाली दिए बात नहीं कर सकता या नहीं कर सकती। ठीक है, मान लिया । लेकिन आपकी अभिव्यक्ति में किसी एक वर्ग का शोषण क्यों?

मां का बलात्कार करने वाला मादरचोद, बहन का बलात्कार करने वाला बहनचोद, हरामी वह व्यक्ति जो हरम में रहने वाली महिला से पैदा हुआ हो क्योंकि हरम में रहने वाली महिला की समाज में कोई इज्जत नहीं थी। उससे उत्पन्न संतान घृणा योग्य है।

साला कितनी साधारण गाली है, यहां तक कि अक्सर छोटे बच्चे तक दे देते हैं अर्थ पत्नी का भाई। पत्नी की बहन साली भी एक साधारण गाली बना दी गई है।

बेटीचोद, बेटी का बलात्कार करने वाला। आप सोच सकते हैं कि मैं यहां बार-बार बलात्कार शब्द क्यों इस्तेमाल कर रही हूँ? क्योंकि हमारे समाज में रिश्ते पवित्र माने जाते हैं। ऐसे में कोई भी मां, बेटी, बहन, बेटे भाई पिता को उस नजर से नहीं देखती। लेकिन यह सच है कि पुरुष समुदाय रिश्तों से भी आगे जाकर संबंध बनाते हैं।

चूतिया एक साधारण गाली है जिसका प्रयोग करते-करते अर्थ कर दिया गया है बेवकूफ। किसी को बेवकूफ कहना हो सीधा चूतिया कह दो। यह शब्द स्त्री की योनि से जुड़ा है। जिससे चूतिया शब्द बना है। यानी इस शब्द का स्मरण करते हैं तो आप स्त्री समुदाय के विरोध में कह रहे होते हैं। जैसे बेटी से बिटिया बनता है वैसे ही चूतिया बनता है।

कुछ लोग अपनी गाली देने के तर्क में यह कह देते हैं कि वह इस शब्द के कई अर्थ जानते हैं, जैसे संस्कृत का च्युत जिसका अर्थ है गिरा हुआ। आम को भी इस शब्द से जोड़ा जाता है।

उदाहरण के तौर पर कोई दो लोग आपस में बात कर रहे हैं, एक कहता है कि तुम चूतिया हो तो मान लीजिए वह कह रहा है, तुम आम हो। तुम गिरे हुए यह अर्थ ठीक हो सकता है लेकिन मजाक मस्ती में ‘तुम गिरे हुए’ हो यह अर्थ नहीं हो सकता। तुम बेवकूफ हो यह ही इसका अर्थ निकलता है यदि आप इसे औरत से जुड़ा हुआ न भी माने तो इसी नाम की एक जनजाति भारत में पाई जाती है। यानी फिर वह वर्ग जो दबाया गया है।

ऐसी तमाम गालियां है जैसे कुत्तिया, रंडी, हरामजादी, चुड़ैल जिन्हें आप जब ध्यान से सोचेंगे तो पता लगेगा कि कहीं ना कहीं यह समाज का वह वर्ग है जो दबाया गया है। जिसका शोषण हुआ है। या यह वह वर्ग है जिसने समाज के नियम कानून को तोड़ा है। उसे भाषा में इतना सरल कर दो कि उसकी लगातार बेइज्जती हो।

लोग अक्सर कहते सुनते मिल जाते हैं खासकर पढ़े-लिखे लोग कि मेरी तो गालियों के बिना बात ही नहीं हो सकती। मैं हर लाइन में गाली देता या देती हूं। ऐसे लोगों से मैं सीधा सवाल मैं पूछती हूं कि क्या आप अपने मां-बाप से गाली में बात कर सकते हैं?

बच्चे के शिक्षक व प्राचार्य से यह कह सकते हैं बहनचोद ये पढ़ता ही नहीं चूतिया है कितना समझाता हूं। या ऑफिस में बॉस को बोल सकते हैं तुम कुछ नहीं जानते हो तुम मादरचोद हो। ऑफिस की मीटिंग में क्लाइंट के साथ क्या आप ऐसे बात कर सकते हैं?

यदि इन सब सवालों के जवाब ना है तो हमें यह समझना पड़ेगा कि गालियां हमारी अभिव्यक्ति की सरलता नहीं है, बल्कि गालियां हमारे दिमाग से होती हुई मुंह से तभी बाहर निकलती हैं जब हम गाली निकाल पाने की स्थिति में होते हैं। यदि सहज प्रक्रिया होती तो हर किसी के सामने गाली ही निकलती। इसीलिए किसी भी जाति , धर्म, समुदाय, लिंग से जुड़ी हम गाली देते हैं तो हम उनके अपराधी हैं और अपराध करना स्वस्थ समाज के लिए हानिकारक है।

गालियां देना भले ही आपके लिए एक सहज क्रिया हो सकती है लेकिन यह सहज बना दी गई है, क्योंकि गालियां भाषाई बलात्कार हैं।

आरती रानी प्रजापति
पीएचडी हिंदी
जेेेेेेएनयू

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