फ़ोटो देख के घबराइए नहीं पापी पेट का सवाल है! निजीकरण के साइड इफ़ेक्ट तो होंगे ही न?

 BY- नीरज 

यह पोस्ट उन लोंगो के लिए है जिनको लगता है कि निजीकरण ही एकमात्र विकाश का विकल्प है और ये छायाचित्र उनके मुंह पर करारा तमाचा है जो निजिकरण का सपोर्ट कर रहे हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था तीन तरह की है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था। 90 के दशक में काँग्रेस की सरकार ने जिस तरह से भारत के बाज़ार को दुनिया के लिए खोल दिया। जिस तरह पूंजीवाद को बढ़ावा दिया गया, समाजवादी अर्थव्यवस्था को चौपट होना उसी दिन से तय हो गया था।

आज की सरकार पूंजीपतियों के लिए जो रास्ता और आसान बना रही है, यह सिर्फ अचानक से नहीं हुआ। बहुत सारे तर्क दिए जा सकते हैं।

समाजवाद अर्थव्यवस्था में हमारे संस्कृति की रक्षा होती है। जब किसी के बेटे की नौकरी लगती है, तब हमारा समाज यह आशा करता है कि उसकी कमाई से वह अपने माँ-बाप और पत्नी और बच्चों का ख्याल रखेगा।

बहुत बार ऐसा देखने-सुनने को मिल जाता है कि पहली पगार एक व्यक्ति ने अपने माँ को दिया। यही समाजवाद अर्थव्यवस्था की खूबी है।

लेकिन जिस तरह से आज सरकार निजीकरण पर जोर दे रही है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आगे चलकर घातक सिद्ध हो सकती है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सबको सिर्फ सरकारी नौकरी ही लगे, परंतु जब तक जिसको जो भी नौकरी लगे उसमें उस पर भारतीय श्रम कानून के तहत ही अधिकार मिलें। लेकिन निजीकरण में भारतीय श्रम कानून की धज़्ज़ियाँ उड़ना तय है।

पूंजीवाद अर्थव्यवस्था ने हमसब को करीब लगभग तीन दशकों तक गुलाम भी बना चुका है। जो लोग निजीकरण को सपोर्ट कर रहे हैं, वो अपने अगल बगल भी झाँक कर देंखे की उनके यहां यदि ठेका पर कोई कार्य कर रहा है तो वो कागज पर कितना देता है और वास्तविकता मेंकितना देता है।

यह तस्वीर महज एक उदाहरण के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। गरीब-लाचार हैं, रेल सेवा के कार्य के लिए लगे हुए हैं। इनकी मजबूरी ही है जो एक तरह का राजा के यहाँ आज ठेका पर कार्य करने को विवश हैं क्योंकि पापी पेट का सवाल है।

बगैर किसी प्रोटेक्शन के कार्य कर रहे हैं। जब तक इनके पास ताकत होगी कार्य कर रहे होंगे , जिस दिन शरीर जबाब दे दिया उस दिन ये खत्म भी हो जाएंगे। श्रम कानून क्या होता है इनको पता भी नहीं है?

नीरज के फेसबुक पेज से साभार

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