और अब संसदीय प्रणाली का पिण्डदान: न जवाब, न जानकारी, न राय रखने की मोहलत!

 BY- बादल सरोज
  • संसद ने पूछा : घर लौटते में कितने मजदूर रास्ते में मरे?
  • सरकार बोली : नहीं पता।
  • संसद ने पूछा : इन मृतकों के परिवार को कोई मुआवजा दिया गया?
  • सरकार बोली : जब मरने वालो का ही रिकॉर्ड नहीं, तो मुआवजे का सवाल ही नहीं उठता।
  •  संसद ने पूछा : कितने लोगों की नौकरियाँ खत्म हो गयीं?
  • सरकार बोली : नहीं पता।
  •  संसद ने पूछा : कोरोना में कितने डॉक्टर्स और चिकित्सीय स्टाफ की मौत हुयी?
  • सरकार बोली : पता नहीं।

प्रश्नोत्तर काल को खत्म किये जाने का एलान तो संसद सत्र शुरू होने के पहले ही किया जा चुका था। ये वे सवाल थे जिन्हें अतारांकित, बिना स्टार वाला सवाल कहा जाता है। मतलब इन्हें लिखकर पूछा जाता है और इनका जवाब भी लिखित में ही दिया जाता है।

कोई चर्चा, प्रतिप्रश्न, पूरक प्रश्न वगैरा नहीं होते। यह संसदीय प्रणाली पर एक बड़ा आघात था, जानबूझकर कान बंद किये बैठी तानाशाही के रास्ते पर नित नए कदम बढ़ाती, हिंदुत्व आधारित फासीराज की कायमी को बेकरार मोदी सरकार द्वारा लोकसभा और राज्यसभा को गूंगा बनाने की एक गंभीर अलोकतांत्रिक हरकत थी।

सवालों से मुंह चुराना और जवाबदेही से बचना चौतरफा नाकामियों से घिरी इस सरकार के पास एकमात्र उपलब्ध चाल है। उसे पता है कि अगर पूछा-बताई का सिलसिला शुरू होगा तो बात दूर तलक जाएगी। अगर ऐसा हो गया तो फेंकने और हांकने से चलने वाली सरकार आँकड़े कहाँ से लाएगी। जो हैं उन्हें कैसे बताएगी?

बेरोजगारी, दलित-आदिवासी-महिला उत्पीड़न और भुखमरी की जद में आये हिन्दुस्तानियों तथा आत्महत्या करने वाले किसानो के आंकड़े तो वह इकट्ठा करना ही बंद कर चुकी है।

अब न उसके पास जीडीपी के चारों खाने चित्त गिरने के बताने लायक आंकड़े है, न तबाह हो चुके उद्योग-धंधों की हालत के दिखाने लायक आंकड़े है और न अकाल मौत मरे छोटे और मध्यम उद्योगों की संख्या की कोई माहिती है।

इन ताजे हादसों की तो छोड़िये, डेढ़ महीने बाद कुख्यात नोटबंदी के चार साल पूरे हो जाएंगे। सरकार के पास आज तक इस बात का आंकड़ा नहीं है कि आखिर कितने पुराने नोट वापस आये। इनकी गिनती अभी चल ही रही है।

प्याज न खाने वाली और इन सब नाकामियों को खुद भगवान् का किया-धरा बताने वाली सरकार के पास उन 14 करोड़ भारतीयों तक का आंकड़ा नहीं है, जिनका काम इस बीच में छिन गया।

जवाब तो उसके पास उन कूटनीतिक मूर्खताओं और विदेश नीति की डरावनी विफलताओं का भी नहीं है, जिनके चलते 134 करोड़ आबादी का देश डोनाल्ड ट्रम्प जैसों का पिछलग्गू बन कर दुनिया भर में मजाक का पात्र बना हुआ है।

मगर जैसे लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली का इतना मखौल काफी नहीं था तो रही-सही कसर इतवार को चली राज्यसभा में उसके नीतीश कुमार नियुक्त उपसभापति हरिवंश सिंह ने पूरी कर दी।

लगभग सभी विपक्षी दलों द्वारा खेती-किसानी के ध्वंस के कानूनों पर मतदान कराये जाने की मांग को दुत्कारते हुए जबरिया उन्हें पारित घोषित कर दिया। विपक्षी सांसद इन्हें और गहरे विचार के लिए सदन की प्रवर समिति को दिए जाने की मांग कर रहे थे।

उपसभापति ने वह कर दिखाया जो इमरजेंसी के काले दिनों में भी नहीं हुआ था। सीपीएम के राज्यसभा सदस्य और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव के.के. रागेश ने तो अपनी सीट पर बैठकर ही मतदान कराये जाने की मांग की थी।

मगर उपसभापति ने उनकी और बाकियों की भी एक नहीं सुनी। उलटे उन्हें सीपीएम के एक अन्य सांसद एलामरम करीम के साथ 8 सांसदों को सदन से निलम्बित कर दिया। यह सब तब हुआ, जब सदन संचालन के नियमों में साफ़-साफ़ लिखा है कि यदि “एक भी सदस्य वोटिंग की मांग करेगा तो मतदान कराना पडेगा।”

मगर जिन्हे संविधान की परवाह नहीं उन मोदी द्वारा नियंत्रित उपसभापति को इन सदन परिचालन नियमों के पालन की फ़िक्र क्यों होती। उन्हें तो देसी-विदेशी कारपोरेटों के लिए भारत की खेती का मटियामेट करने की इतनी जल्दी थी कि वोटिंग में खर्च होने वाले पांच-सात मिनट की देरी भी उन्हें नागवार गुजर रही थी।

उन्हें इन बिलों पर थोड़ी-बहुत चर्चा भी बोझ लग रही थी, इसलिए पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा को उन्होंने अपनी बात ही पूरी नहीं करने दी। लोकसभा में बिना चर्चा के और राज्यसभा में आपाधापी में पारित कराने का नजारा सिर्फ घोर अलोकतांत्रिक ही नहीं है, यह संसदीय प्रणाली का भी पिण्डदान है।

यह उन अध्यादेशों को क़ानून बनाने की हड़बड़ी है जिनके खिलाफ सिर्फ किसान भर ही आंदोलित नहीं है, समूचा देश चिंतित है। आक्रोश और बेचैनी इतनी जबरदस्त है कि खुद एनडीए में रार मची पड़ी है। अकाली दल की एक मंत्राणी इस्तीफा दिए बैठी हैं।

कार्पोरेटी हिंदुत्व पूंजी के मुनाफे की बर्बर तानशाही की दिशा में हर सप्ताह एक नया कदम रख रहा है। हर बार किसी न किसी संवैधानिक संस्था को हड़प रहा है। बहुमत और जन भावनाओं को दरकिनार करने, कानूनों और प्रावधानों को निरर्थक करने के लिए हजार नयी तिकड़में खोजी जा रही हैं।

चौथा खंभा हड़पा जा चुका है। कार्यपालिका को पालतू बनाया जा चुका है। अब न्यायपालिका और विधायिका निशाने पर हैं। इसके लिए एक-एक मोहरा ही काफी है। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस में जो चिंता जताई गयी थी, वह सामने आ गयी है।

रोस्टर प्रणाली का दुरुपयोग करके सारे राजनीतिक रूप से संवेदनशील और अडानी जैसों से जुड़े आर्थिक घपलों और घोटालों को एक ख़ास जज की बेंच के हवाले करके सर्वोच्च अदालत को नाथने की पतली गली खोजी जा चुकी है।

इसके नतीजे देश देख ही रहा था कि एक उपसभापति को साध कर राज्यसभा को स्वांग बनाकर रख दिया गया। जनता के बीच उन्मादी और भावनात्मक मुद्दे उछालने के लिए एक पल भी जाया नहीं किया जा रहा है।

मगर इतिहास गवाह है कि किसी भी तरह की तानाशाही के लिए राह आसान नहीं रही है। यहां तो और भी नहीं रहेगी क्योंकि जनता, खासकर मेहनतकश जनता के संगठन इसके मुकाबले के लिए सन्नद्ध हैं। अध्यादेशों को गैरकानूनी तरीके से कानून बनाने के पहले ही 25 सितम्बर की कार्यवाहियों का एलान किया जा चुका है।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पंजाब, हरियाणा में इस दिन भारत बंद और बाकी सब जगह रास्ता रोको सहित जुझारू कार्यवाहियों को देश-दुनिया देख चुकी है। यह दिन ऐसी विरोध कार्यवाहियों का दिन था।

जिसके बाद शुरू होने वाली आंदोलनों और उभार की श्रृंखला इन नीतियों की ही नहीं, इसके पीछे की राजनीति की भी उल्टी गिनती शुरू कर देगी।

ट्रेड यूनियनों के साझे मंच ने 23 सितम्बर को देश भर में प्रदर्शनों का ताँता बाँध दिया। महिला, विद्यार्थी और युवा इन सबके साथ भी हैं और अलग से भी मोर्चा खोले हुए हैं।

इन शानदार प्रतिरोधों के बीच शहीद भगत सिंह की जन्मतिथि 28 सितम्बर पड़ रही है। देश, संविधान और भाईचारा बचाने वाली ताकतों ने इस दिन भी विशेष संकल्प कार्यवाहियों का मंसूबा बनाया है।

बहरा बनने का दिखावा कर रही सरकार के कान खोलने के लिए भगतसिंह के संदेश वाले धमाकों को सुनाना ही होगा। और जैसा कि सीटू सहित अनेक श्रम संगठनो के एकजुटता की घोषणा के बाद जाहिर हो गया है कि यह धमाके सिर्फ खेत, खलिहान, गाँव, देहात से ही नहीं गूंजेंगे, कारख़ाने और काम के ठियों से भी सुनाई देंगे।

लेखक पाक्षिक लोकजतन के संपादक और अ.भा.किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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